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Agriculture soil,best soil for all crops,#soil science. hindi & english



मृदा विज्ञान (SOiI. SCIENCE)

विज्ञान (soil science):



सॉयल शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के सॉलम (Solum) शब्द से हुई 

#nextmefood_soittest

जिसका अर्थ फर्श (Floor) होता है।आधुनिक मृदा विज्ञान पितामह- वी.वी डोकुचेय 2015 को अन्तर्राष्ट्रीय मृदा वर्ष घोषित (Healthy Soil किया गया।

For Healthy Life

  1.   मृदा में NPK 4:21. (उपयुक्त NPK अनुपात) में डालने चाहिए परन्तु भारत में यह अनुपात 6.5 2.5 1 है।यह एक त्रिविमीय काय (3-dimentional body) है। मृदा जाँच (Soil Testing) के पितामाह M.L Troung कहलाते है।
  2. कृषि रासायनिकी - Chemistry ) के पितामाह J.V. Licbig कहलाते है। पेडोलोजी के अनुसार मृदा एक प्राकृतिक पिण्ड है।
  3. II.S.S. (इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉयल साईन्स) भोपाल (MP) में स्थित।
  4. मृदा एक परिर्वतनशील प्राकृतिक पिण्ड है, जो कार्बनिक पदार्थ, खनिज पदार्थ एवं सूक्ष्म जीवों के संगठन से बनी है एवं पौधों को उगने के लिए आधार प्रदान करती है वह मृदा (Sol) कहलाती है।
  5. यह पृथ्वी की ऊपरी सतह बनाती है तथा सभी विशेषताऐं जैसे- पेतृक पदार्थ, जलवायु एवं जीवन की दीर्घ कालीन क्रियाओं का फलन है।


पेडोलोजी (Pedology) -


  1. पेडोलोजी ग्रीक शब्द है मृदा के उदभव (जन्म), वर्गीकरण तथा वर्णन के अध्ययन को पेडोलोजी कहते है।
  2. पेडोलोजी शब्द सर्वप्रथम V.V. डोकोचेव ने दिया इसलिए V.V. डोकाचेव को मृदा विज्ञान का पितामाह कहते है।
  3. इडोफोलोजी (Edophology) -
  4. इस विज्ञान में मृदा के विभिन्न गुणों का अध्ययन पौधों की वृद्धि, पोषण एवं उपज के सम्बन्ध में किया जाता है वह इडोफोलोजी कहलाती है।
  5. भूमी का सोलेराइजेशन (Soil solarization) फल व सब्जियों की नर्सरी भूमी तैयार करने हेतु सोलेराइजेशन आवश्यकहोता है इससे भूमिजनित रोग एव कीटों के अण्डों की रोकथाम हो जाती इसके लिए नर्सरी वाली जगह को गर्मी के दिनों में (अप्रैल-जून) माह में सिंचाई करके पारदर्शी (सफेद) पॉलिथीन से 4-6 सप्ताह तक ढक देते है जिससे भूमी का तापमान 10-15 c बढ़ जाता है और फंफूद व कीटों के अण्डे मर जाते हैं।


मृदा निर्जमीकरण (soil sterilization) -

नर्सरी की बेड व पोली हाऊस में पौध रोपण से पूर्व मृदा को हल्की करके फॉमेलीन दया से aliti प्रति वर्ग मीटर की दर से उपचारित करने मृदा में उपस्थित हानिकारक फफूंद, कीट, खरपतवार एव सुत्रकृमी नष्ट है। जाते है।

मृदा निर्माण (Soil formation) -

मृदा का निर्माण रासायनिक, जैविक एवं भौतिक कारकों द्वारा चट्टानों एवं
खनिजों के विघटन से हुआ है। मृदा निर्माण एक धीमी प्रक्रिया है सामान्यतः एक इच मृदा निर्माण 800-1000 वर्षों में होता है। मृदा वैज्ञानिक जोफे (Joffe, 1949) के अनुसार मृदा निर्माण के प्रमुख कारक है।



सक्रिय कारक (Active factors) -

जलवायु (तापमान, वर्षा) सबसे महत्वपूर्ण कारक

जैवमंडल (Biosphere Vegetation, Micro-organism)

अक्रिय कारक (Passive factors) :

पेतृक पदार्थ (Parent material)

उच्चावच (Topography/relief)
.

समय (Time) या मृदा की आयु (Age of soil)
मोलिनाइट

  1. इसकी प्रकृति अविस्तारित (Non Expanding type) : 1 Type होती
  2. फास्फोरस का सबसे ज्यादा स्थिरीकरण केओलिनाइट करता है।
  3. | मोन्टमोरिलोनाइट. इसकी प्रकृति विस्तारित (Expanding type ) व 21
  4. Type होती है। यह काली कपास मृदाओं में पाया जाता है जिसके कारण मृदाएं फैलती है व सिकुड़ती है परिणामस्वरूप मृदाओं में दरारें आ जाती है।
  5. इसकी प्रकृति सिमित विस्तारित (Limited Expanding type) व 2: 1 Type होती है।
  6. मृदा में सिलीकेट क्ले मिनरल व हूमस की प्रकृति कोलोयडल होती है। मृदा मे CEC (घनात्मक आयन विनिमय क्षमता) का क्रम
  7. हूमस (200) > वर्मीकुलाइट (100-150) > मोन्टमोरिलोनाइट (80-150) > केओलिनाइट
  8. पृथ्वी की सतह (Earth crust) में सबसे अधिक फेल्डसपार जबकि मृदा में सबसे अधिक क्वार्टज खनिज पदार्थ पाया जाता है।
  9. क्वार्टज का सबसे कम व डोलोमाइट का सबसे अधिक विघटन होता है। पृथ्वी की सतह (Earth crust) में सबसे अधिक पाये जाने वाला तत्व ऑक्सीजन है।
  10. मृदा में वायु का संगठन (Composition of soil air)
  11. मृदा में वायु वृहत रन्नों (Macro-pores) में पाई जाती है।
  12. सबसे अधिक कुल रन्ध्रावकास क्ले मृदा में इसके बाद सिल्ट व बालू मृदा होते हैं।
  13. मृदा में 10% से कम वायु होने पर जड़ो की वृद्धि रूक जाती है।
  14. 78 % नाइट्रोजन (वातावरणीय नाइट्रोजन के बराबर ) ।
  15. 20.3 % ऑक्सीजन (वातावरणीय वायु की अपेक्षा हल्की सी सान्द्रता है) 0.25 0.30% (3000ppm) कार्बन डाई ऑक्साइड (इसकी मृदा में 8 से 10
  16. प्रतिशत मात्रा बढ़ी है) परिच्छेदिका (Soil Profile)...
  17. यह मृदा का एक उर्ध्व (Vertical) खण्ड है जो मृदा के सभी निम्न सस्तरों (Horizones) से गुजरता है तथा मृदा के पैतृक पदार्थों तक फैला हुआ भागा


मृदा संस्तर (Soil Horizones)

  1. यह मृदा की समान गुणों एवं संगठन की एकीकृत परत है।
  2. वनों की भूमि को O, A, B एवं C संस्तरों में विभाजित किया गया है। सामान्य मृदाओं में A, B एवं C संस्तर पाया जाता है।
  3. कार्बनिक (O) संस्तर
  4. यह मुख्यतः वनों की मदाओं की ऊपरी सतह पर पाया जाता है। • सामान्यत यह अकृषित भूमी (Virgin Soil) में पाया जाता है, तथा कृषित (Arable Soil) में अनुपस्थित होता है। 2 एलूवियल या (A) संस्तर -
  5. यह मृदा का सबसे ऊपरी खनिज संस्तर है जो सतही मृदा कहलाता है। इस संस्तर को (Washing out) या अधिकतम निक्षालन (Maximum leachingy| जोन कहते हैं। क्योंकी इस संस्तर में पोषक तत्व गतिशील होकर निकालित हो जाते है सभी कृषि क्रियाएं इसी स्तर में होती है। 3. इलूवियल या (B) संस्तर -
  6. सभी प्रकार के लवण इस सस्तर में जमा (Accumulate) होते है। इसलिए इस क्षेत्र को (Washing in) या पोषक तत्वों का गतिहीन (Immobilization) जोन कहते हैं।
  7. इस संस्तर को अधो मृदा संस्तर भी कहते है।
  8. इस तरह की मृदा में कृषक क्रियाऐं संभव नहीं होती हैं
  9. C संस्तर
  10. अल्प विकसित मृदा का संस्तर है जिसे पेतृक स्तर भी कहते है।
  11. इस तरह की मृदा में Ca, Mg कार्बोनेटस जमा होते हैं। यह संस्तर सोलम परत (A +B Horizons) के नीचे पाया जाता है।


सॉलम (Solum)

  1. मृदा के A एवं B संस्तरों को संयुक्त रूप से सॉलम कहते हैं, जो Inme Soil के नाम से भी जाना जाता है।


रिगॉलिथ (Regolith) -

  1. मृदा के A, B तथा C संस्तरों को संयुक्त रूप से रिगोलिथ कहते हैं। रिगोलिथ ही मृदा का निर्माण करता है।


रिगोसॉल (Regosol)

  1. मृदा के अविभिक्त (Azonal) संस्तरों को रिगोसॉल कहते हैं।


फरोस्लाइस (Furrow slice) -

  1. एक हेक्टेयर मृदा की 0 से 15 सेमी मोटी परत जो हल द्वारा जोती जाती है।


  1. इसका शुष्क वजन 2.5 x 10 kg/ha (150 tones/ha) होता है।
  2. • सामान्यत सभी फसलों की बुआई जुताई एवं जड़े सतही मृदा या फरोस्लाइस में होती है।


चट्टानों के प्रकार -


जी के अनुसार मृदा एक प्राकृतिक पिण्ड (Natural body) है।
पेट्रोलोजी (Petrology) के अन्तर्गत किया जाता है। 1. आग्नेय चट्टान (Igneous rock) उदाहरण ग्रेनाइट, बेसाल्ट ।

2 परतदार (Sedimetery) - उदाहरण- 3 चुना पत्थर, बालुपत्थर, डोलोमाइट। कायान्तरित / रूपान्तरित (Metamorphic) उदाहरण संगमरमर क्वॉर्टजाइट, स्लेट।

आग्नेय चट्टान (Igneous rocks) :

अधिक ताप के कारण पिघले हुए लावे के पृथ्वी की सतह पर ठंडा होकर ठोस रूप में एकत्रित होने से बनी चट्टान को आग्नेय चट्टान कहते है।

• इसे मूल चट्टान (Parent rocks) भी कहते है।
क्योंकी पृथ्वी की पपड़ी (Earth crust) का 95% भाग इन्ही चट्टान से निर्मित है।

यह दो प्रकार की होती है

i. अम्लीय / Intrusive / Plutonic आग्नेय चट्टान -

ये भूमि की सतह पर बनती है व अधिक सिलिका पाया जाता है।

उदाहरण- ग्रेनाइट

Volcanic आग्नेय चट्टान ii क्षारीय / Extrusive

ये भूमि की सतह के नीचे बनती है व कम सिलिका पाया जाता है।

उदाहरण- बेसाल्ट परतदार चट्टान (Sedimentory rocks)

वायु एवं जल द्वारा प्राचीन चट्टानों के अपक्षय से प्राप्त पदार्थ दूसरे स्थान पर जाकर परतों के रूप में जम जाते है उन्हे परतदार चट्टान कहते है। परतदार चट्टानों में जीवाश्म (Fossils) पाये जाते है।
परतदार चट्टानों में ही पेट्रोलियम पदार्थ पाये जाये जाते है।

उदाहरण- बालू पत्थर (sand stone), जिप्सम, खड़िया।

कायान्तरित चट्टान (Metamorphosis rocks) : ये चट्टाने उच्च दाब व ताप से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों में परिवर्तन।
के फलस्वरूप बनती है। ये चट्टाने सबसे ज्यादा कठोर (Hard) होती है।

उदाहरण- स्लेट, सगमरमर (Marble), लकड़ी का कोयला।

कायान्तरित चट्टान मार्बल क्वार्टजाइट स्लेट

ग्नीस (Gneiss)  सिस्ट

मृदा क्षरण (Soil Erosion)
निमार्ण कहा से (मूल पदार्थ)
चूना पत्थर से
बालू पत्थर से
शेल सें
ग्रेनाईट से
बेसाल्ट से
भौतिक रूप से मिट्टी के कणों का अपने स्थान से हटने की क्रिया को मृदा
क्षरण कहते है। अथवा मृदा का पृथक्करण तथा परिवहन मृदा क्षरण कहलाता है।
मृदा अपरदन दर 12 टन/हेक्टेयर / प्रति वर्ष से अधिक नहीं होना चाहिए।
जबकि भारत में यह 16 टन / हेक्टेयर / प्रति वर्ष है। वेव अपरदन- जल एंव वायु के संयुक्त प्रभाव से होने वाला अपरदन।

• एन्थ्रोपोजेनिक अपरदन भूमि पर पशुओं की अधिक चराई से होता है।
ऐलूवियल – जल द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी से बनी मृदाएं।
ऐओलियन / लोएस वायु द्वारा लाई गई मिट्टी से बनी मृदाएं। प्रकृति में दो प्रकार से मृदा क्षरण होता है

1. प्राकृतिक क्षरण (Natural erosion) :

वनस्पति से ढकी हुई मृदा के प्राकृतिक रूप से हवा तथा जल द्वारा
लगातार और धीरे-धीरे क्षरण को प्राकृतिक क्षरण कहते हैं। यह क्षरण मृदा निर्माण तथा मृदा विनाश की क्रियाओं को सदैव साथ रखता है।
इससे कोई विशेष हानी नहीं होती है क्योंकि परिवर्तन में बहुत समय लगता है।

2. त्वरित क्षरण (Accelerated erosion ) -

यह मानव क्रियाओं द्वारा होता है जैसे वनों की कटाई, भूमि की वनस्पति को पशुओं द्वारा चराकर, खोदकर या जोतकर समाप्त कर दिया जाता है। जिससे भूमि वनस्पति विहीन हो जाती है। इस प्रकार वनस्पति विहीन भूमी का जल व वायू द्वारा क्षरण त्वरित क्षरण कहलाता है। यह क्षरण सर्वाधिक नुकसानदायक होता है लेकिन मनुष्य द्वारा रोका जासकता है। क्षरण के कारक मृदा क्षरण दो शक्तियों के द्वारा होता है जल तथा वायु द्वारा।

वायु द्वारा क्षरण (Wind Erosion)

यह क्षरण शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों, व्यर्थ या बंजर भूमि जो मुख्यतः वनस्पति विहिन है उन मृदाओं में सर्वाधिक होता है। राज्य के उत्तरी व पश्चिमी क्षेत्रों में कम वर्षा होती है यहां मई जून में तेज आंधिया चलने से सर्वाधिक वायु क्षरण होता है।

सतह सपर्ण (Surface Creep): मृदा कण जिनका व्यास 0.5 मि.मी. से अधिक होता है ये कण वायु की गति से ऊपर नहीं उठते है। तथा भूमि की सतह पर रेंगकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित हो जाते हैं इस क्रिया को सतह सर्पण कहते है। मृदा क्षरण का 5 से 25 प्रतिशत क्षरण इसी क्रिया द्वारा होता है।

उच्छलन (Saltation) :

जब मृदा पर हवा का सीधा दबाव पड़ता है। तो मुख्यतः 0.1 से 0.5 मी. मी व्यास वाले कण अपने स्थान से ऊपर उछलते हैं। और थोडे चलकर गिर जाते है इस क्रिया को उच्छलन कहते हैं।
मृदा का 50-75 प्रतिशत वायु क्षरण इसी क्रिया से होता है।

निलम्बन (Suspension) -

वे मृदा कण जिनका व्यास 0.1 मिमी या इससे कम होता है।
ये हवा के द्वारा वातावरण में उड़ते रहते है, जो हजारों किलोमीटर तक स्थानान्तरित हो जाते हैं।
इस क्रिया द्वारा कुल वायु क्षरण का 3-4 प्रतिशत होता है।

जल द्वारा मृदा क्षरण (Water erosion)

बौछार क्षरण (Rain drop / Splash) -

यह मृदा क्षरण की प्रारम्भिक अवस्था है।
इसमें मृदा कण वर्षा बूँदों के प्रभाव से अपने मूल स्थान से टूटकर हट जाते है।
यह क्षरण वर्षा की बूंदों के आकार, गहनता व त्वरितता से होता है। परत क्षरण (Sheet erosion) -
जल क्षरण की दूसरी अवस्था है।
उपजाऊ मिट्टी का सबसे ज्यादा अपरदन इसी से होता है, क्योंकि


.

मिट्टी की पतली परत नष्ट हो जाती है। परत क्षरण आंखो द्वारा दिखाई नही देता लेकिन मृदा की उर्वरक सतह
को बहा ले जाता है इसलिए यह विनाशकारी होता है। जब पानी ढाल की ओर बहने लगता है, तो खेत में छोटी-छोटी नालीय बन जाती है जो सामान्य कृषक क्रियाओं द्वारा समाप्त की जा सकती

रिल क्षरण (Rill erosion)
अवनालिका क्षरण (Gully erosion) : रिल क्षरण की बढ़ती अवस्था है।
जहां खेत में ढलान अधिक होता है वहां नालिया गहरी, बड़ी व चौड़ी हो जाती है।
इसलिए इसमें कृषि क्रियाएँ करना कठिन हो जाती को अवनालिका या नालीदार क्षरण कहते हैं।
अवनालिका क्षरण जल द्वारा क्षरण की अवस्था में सबसे भयकर या सर्वोधिक जल क्षरण की अवस्था है।
इसे अघो मृदा क्षरण भी कहते है यह कोटा के आस पास चम्बल
क्षेत्र में अधिक होता है।

मृदा संरक्षण (Soil conservation)

मृदा संरक्षण की विधियां -

जल अपरदन को रोकने की विधियाँ (अ) सस्य सम्बन्धि विधियां- भूमि पर 2 प्रतिशत ढ़ाल तक उपयुक्त है।

1. समोच्च खेती (Contour farming):
समान ऊँचाई की भूमि पर बनी हुई रेखा को कन्दूर कहते हैं। • इसमें सभी कृषक क्रियायें एवं फसल की बुआई भूमी के ढ़ाल

विपरित करते है।

2. भू- परिष्करण (Tillage):
3.

भू- परिष्करण की सही विधियाँ अपनाना जैसे- बारानी क्षेत्रों में गहरी

जुताई करना आदि। मल्चिंग (Mulching) :
• इसमें घास, फूल, पत्तियों व प्लास्टिक के द्वारा खेतों को ढ़क कर रख हैं।
 

4. फसल चक्र (Crop rotation):


मृदा के उपयुक्त फसल चक्र अपनाने से मृदा क्षरण कम होता है। 5. पट्टियों में फसल बौना (Strip cropping): ढाल के विपरित समानान्तर पट्टियों में फसल बोना मृदाक्षरण कोरोकता है।
इसमें अपरदन फसलों (मक्का, ज्वार बाजरा) के साथ अपरदन को कम करने वाली फसले (मुंग, चंवला, मोठ) एकान्तर क्रम में उगाते है। की यांत्रिक विधियाँ भूमि पर 2 प्रतिशत से अधिक को बढ़ाने वाली कन्टूर खाई बनाना (Contour ढलान के अनुसार अलग-अलग क्यारिया बनाना। terrace) -बाल हेतु उपयुक्त है।

इससे खेत का अतिरिक्त जल बाहर निकालना। terrace) -  जिगं टेरेस (Zing यह 310 प्रतिशत ढलान वाली भूमि में प्रयुक्त होती है। 60 से. मी. चोडी व 30 से.मी. गहरी तथा उपयुक्त लम्बाई की खाई
उचित अन्तराल पर खोदी जाती है। ■ इन खाइयों में पेड़ों की रोपाई की जाती है।

बेच टेरेस (Bench Terrace) :

यह 16–33 प्रतिशत ढलान वाली भूमियों में अपनाते 2 ब्रोड बेड एण्ड फरो (Broad bed and Furrow) –
यह विधि गहरी काली कपास मृदाओ में प्रयुक्त होती हैं। यह विधि मानसून में दल-दली मृदाओं में प्रयुक्त होती 5 वानस्पतिक प्रतिरोध (Vegetative barrier) खस घास (वेटिवेरिया), दूब घास आदि लगाकर।

6. एग्रो फोरेस्ट्री (Agroforestry):
कृषि फसलों के साथ में उद्यानिकी, वानिकी व झाड़ियों की खेती करना।

उर्व मल्च (Vertical mulch):

• हल्की व गहरी खाईया ढलान के विपरित दिशा में बनाना।
• फसले जैसे- कहवा, चाय, कॉफी आदि बागानो में प्रयुक्त होती है। अधोभूमि की गहरी जुताई
सब सोयलर की सहायता से भूमी की कठोर परत को तोड़कर 30 सेमी गहरी जुताई करना।

वायु अपरदन को रोकने की विधियाँ -

1. वायुरोधी पट्टियों का निर्माण
हवा की दिशा के विपरित भौतिक संरचना (विन्ड ब्रेक) एंव पौधों एंव झाड़ियां (शेल्टर बेल्ट) लगाना।
 

(Soil water) -

मृदा कणों के बीच रन्ध्रावकाशो (Pore space) में उपस्थित जल को मृदा कहते है। यह सामान्यतः सूक्ष्म या माइक्रोपोर में पाया जाता है। मृदाजल मुदा में bar, atm, Mega pascle (1 bar = 0.1Mpa ) pF द्वारा प्रद किया जाता है।

संसजन (Cohesion) :

• समान प्रकृति के अणुओं के मध्य आकर्षण जैसे जल के एक अणु का अणु से ।
आसंजन (Adhesion) :

असमान प्रकृति के अणुओं के मध्य आकर्षण जैसे जल के अणु का मृदा अणु से मृदा जल का वर्गीकरण -

1. आर्दताग्राही जल (Hygroscopic water) –
जब मृदा में जल कणों के चारों और वाष्प या पतली परत के रूप में होता है।
मृदा में इस जल की मात्रा न्युनतम व पौधों को अनुपलब्ध होता है। यह जल मृदा में सबसे अधिक बल (31bar) या अधिक पर संग्रहित रहता है।

2. गुरुलीय जल (Gravitional water) :
मृदा में अधिक मात्रा में जल आ जाने पर वह गुरुत्व बल के कारण नीचे को रिस्ता है। मृदा में रन्ध्रों के बीच स्वतंत्र अवस्था में रहता है। यह पौधों को उपलब्ध नही होता है।

यह जल मृदा में -1/3 bar बल से कम बल पर (0. 10.32 barसंग्रहित रहता है।

3. केशीय जल (Capillary water) : यह जल मृदा में आर्द्रताग्राही जल और क्षेत्रधारिता (Field capacity) के
मध्य उपलब्ध रहता है। यह जल पौधों की जड़ों को आसानी से उपलब्ध हो जाता है। यह जल मृदा में 1/3 से 31bar बल के मध्य संग्रहित रहता है। तथा पौधों द्वारा उपयोग में लिया जाने वाला जल केशीय जल ही होता है।
 

क्षेत्र क्षमता (Field capacity) -

सिंचाई के 36 48 घन्टे बाद जो जल की मात्रा खेत में पृथ्वी के • गुरुत्वाकर्षण बल के विरूद्ध धारण करके रहती है वह जल की क्षेत्र क्षमताकहलाती है।

● क्षेत्र क्षमता पर मृदा जलदाब -1/3 bar (0.33 bar) होता है। धारण क्षमता (Water Holding Capacity)

• मृदा में उपस्थित कुल जल की यह अधिकतम मात्रा जो मृदा कणों द्वारा धारण की जा सके "जल धारण क्षमता कहलाती है।
सनी बिन्दु (Wilting point ) -

1. अस्थायी म्लानी बिन्दू - मुरझाहट की वह अवस्था जिसमें मुरझाये हुए को सिंचाई देने पर समाप्त हो जाती है।
2 स्थाई म्लानी बिन्दू (Permanent Wilting Point/ PWP) - जब सिंचाई करने के बाद भी मुरझाहट समाप्त न हो वह स्थाई म्लानी बिन्दू कहलाती है।

.म्लानी बिन्दू पर मृदा नमी तनाव -15 bar होता है।

झम मुरझान गुणाक (Ultimate wilting point) - इस बिन्दू पर मृदा नमी तनाव -60 bar होता है।

इस बिन्दू पर पौधे जल अभाव में मर जाते है। | प्राप्य जल उपलब्ध जल (Available water) —

• मुरझान गुणांक (Wilting Cofficient) एवं क्षेत्र क्षमता (Field capacity) के बीच जो जल की मात्रा होती है वह "प्राप्य जल" (Available water) कहलाता है।
● म्लानी बिन्दू (15 bar) व क्षेत्र क्षमता (-1/3 bar) के बीच उपलब्ध जल को ही प्राप्य जल कहते है।

पौधों को यही जल उपलब्ध होता है जो सूक्ष्म रन्ध्रो या केशिकाओं में पाया जाता है।
इसे Sehocfild (1935) ने परिभाषित किया।
यह एक कॉलम के ऊपर उपस्थित मुक्त जल के तल को सेमी ऊंचाई में व्यक्त करता है।
टेन्सियोमीटर (Tensiometer) द्वारा यह केवल 0.85 बार मृदा नमी तक संवेदी होता है।

• इसलिए यह बालू मृदा के लिए उपयुक्त है क्योंकि बालू मृदा में तनाव बार से कम होता है।
यह चिकनी (Clay) मृदा के लिए उपयुक्त नहीं है। यह फसलों को निश्चित (कम) अन्तराल पर पानी (सिंचाई) देने हेतु

2. जिप्सम ब्लॉक / विद्युत् प्रतिरोध / बायोपस नमी मीटर - लम्बे अन्तराल पर सिंचाई करने वाली फसलों (0-15 bar) मे उपयुक्त उपयुक्त है।
यह विद्युत प्रतिरोध पर निर्भर है। जिप्सम ब्लॉक शुष्क (Clay) मृदा में सन्तोषजनक कार्य करता है। यह लवणीय मृदा में उपयुक्त नहीं है क्योंकि लवणता विद्युत चालकता बढ़ाती है।

न्यूट्रोन नमी मीटर (Neutron moisture meter) : -

खेत में नमी (त्वरित नमी) ज्ञात करने का यंत्र है। यह खेत में नमी की मात्रा ज्ञात करने की श्रेष्ठ विधि है।

4. प्रेसर मेम्ब्रेन एण्ड प्रेसर प्लेट एपारेटस :
इसे प्रयोगशाला में मृदा की नमी ज्ञात करने में प्रयोग करते है।

यह 015 Bar (दाब) तक मृदा नमी तनाव पर कार्य करता है।
मृदा की विशेषताएं (Soil properties) =
मृदा कणाकार (Soil Texture) :
मृदा में बालू, सिल्ट तथा मृत्तिका (क्ले) के कणों के सापेक्ष अनुपात को मृदा गठन या मृदा कणाकार कहते है।
यह मृदा की मूल विशेषता है इसे बदला नहीं जा सकता है।
सबसे महीन कण मृत्तिका (क्ले) के होते है।
इसलिए सबसे अधिक क्रियाशीलता एवं जल धारण क्षमता मृत्तिका
बालू मृदाऐं (Sandy soils) :
मृदाएं जिनमें 70% से अधिक बालू कण एवं 15% से कम क्ले कण होते हैं।
Te gen (Silt soils):(Clay soils) :(Loamy soils):
मृदाऐं जिनमें बालू सिल्ट एवं क्ले कण समान मात्रा में नहीं पाये जाते है। परन्तु ये कण समान गुण प्रर्दशित करते हैं।

हल्की मृदाऐं (Light soils):

• मृदाएं जिनमें बुआई जुताई करना आसान होता है जैसे बालू मृदाऐ।
ये मृदाएं मूंगफली आलू आदि के लिए उपयुक्त है। मारी मृदाऐं (Heavy soils):

● मृदाऐं जिनमें बुआई जुताई करना आसान नहीं होता है जैसे- सिल्ट व क्ले

मृदाऐं।

ये मृदाएं धान, कपास आदि के लिए उपयुक्त है।

मृदा संरचना (Soil structure ) :

मृदा में बालू सिल्ट व क्ले कणों का व्यवस्थापन मृदा संरचना कहलाता है। मृदा का यह गुण कृषि क्रियाओं द्वारा परिवर्तित हो जाता है।

मृदा की स्फेरोयडल संरचना (क्रम्बी संरचना जिसमें रन्ध्र पाये जाते हैं) फसल

उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त होती है।

मृदा घनत्व (Soil density)

मृदा घनत्व पिक्नोमीटर (Picnometer) द्वारा ज्ञात किया जाता है। मृदा घनत्व दो प्रकार की होती है:

कण घनत्व (Particle Density ) -

यह ओवन (Oven) में सुखाई गई मिट्टी के कणों का घनत्व है जो मिट्टी से हवा के निकालने के बाद ज्ञात करते है।

कण घनत्व = कणों का वजन (Mass)

कणों का आयतन (Volume)

साधारण मृदा का कण घनत्व (Particale density) = 2.65g/cm'or g/cc होती है।

कण घनत्व को वास्तविक घनत्व या सापेक्ष घनत्व भी कहते है।

बालू मृदा का कण घनत्व ज्यादा होता है। क्योकि इसमें मृदा कणाकार

ज्यादा मात्रा में होते हैं।

मृदा में कार्बनिक पदार्थ मिलाने पर कण घनत्व कम हो जाता है।

इसलिए काली मृदा का कण घनत्व कम होता है। मृदा रन्ध्रता का कण घनत्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

स्थूल घनत्य (Bulk density)


यह ओवन में सुखाई गयी मुदा के वजन एवं रन्ध्र युक्त मृदा जल द

वायु) का आयतन का अनुपात है।

स्थूल घनत्व ओवन में शुष्क मृदा का वजन (Weight)

मृदा (जल व वायु युक्त) का आयतन (Volume)

सामान्य मृदाओं का स्थूल घनत्व 1.33g/cc

बालू मृदा का स्थूल घनत्व काली मृदा से अधिक होता है।

भू-परिष्करण क्रिया (Tillage operation) मृदा करती है। स्थूल घनत्व कम

मृदा में रन्ध्रता (जल व वायु रन्ध्र) व कार्बनिक पदार्थ बढ़ने पर स्थ

घनत्व कम होता है।

कार्बन नाईट्रोजन अनुपात (CN ratio) -

मृदा में कार्बनिक कार्बन एंव उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा का वजन है। * हुमस (Humus) का CN अनुपात 10:1

सामान्य मृदा का CN अनुपात - 10:1- 12:1

ॐ सुक्ष्म जीवों का CN अनुपात - 4:1 से 9:1 गोबर की खाद (FYM) का C:N अनुपात - 20:1

दलहनी फसल का CIN अनुपात - 20:1

सकरा CN अनुपात भूमि के लिए उपयुक्त होता है एंव चोड़ा अनुपात भूमि में नाइट्रोजन की कमी को प्रदर्शित करता है।

* कार्बनिक मृदाओं (Organic soil) में कम से कम 20% कार्बनिक पदार्थ पाये
जाते है।

भारतीय मृदाओं में सामान्यतया 0.5% कार्बन पाया जाता है। * पश्चिमी राजस्थान की मृदाओं में सामान्यतया 0.1% से कम कार्बन पाया जाता है।

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